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पुट्टपर्ती ग्राम और उसके नाम की कहानी

 

पुट्टपर्ती चित्रावती नदी के किनारे बसा हुआ एक छोटा सा गाँव है | यह मनोरम स्थल चारों ओर पहाड़ियों से घिरा हुआ है |

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आज भी पुट्टपर्ती ग्राम के निवासी इस दुःखद घटना का प्रमाण देते हुए एक गोल सा पत्थर दिखाते हैं जो एक तरफ से थोड़ा सा टुटा हुआ है। इस पत्थर पर एक लाल निशान है| ऐसा विश्वास किया जाता है की यह लाल निशान एक नाग के खून का निशान है| शीघ्र ही इस श्राप से छुटकारा पाने की इच्छा से उस पत्थर की पूजा की जाने लगी |उस पत्थर को ग्वालों के भगवान गोपाल कृष्ण का स्वरूप मान कर ,एक मंदिर बनाकर , उसमें उसकी स्थापना की गई और पीढ़ी -दर -पीढ़ी स्त्री -पुरूष उसकी पूजा करते रहे |

कुछ वर्ष पूर्व उस पत्थर की महीमा प्रकट करने के लिए बाबा ने गाँव वालों से कहकर उसे अच्छे से धुलवाया| फिर जिस ओर निशान था, पत्थर के उस ओर चंदन का लेप कराया | अब यह किया गया तो भगवान श्रीकृष्ण के मनोरम गोपाल-स्वरूप की मूर्ति उभर आई | गोपाल एक गाय के सहारे खड़े हैं और उनके होंठों पर मुरली है| आज भी ग्रामवासी कहते हैं की मंदिर में से मुरली की मधुर ध्वनि सुनाई देती है |

उसी दिन से पुट्टपर्ती ग्राम पुनः सम्पन्न हो गया | एक बार फिर स्वस्थ और दुधारू पशुओं की संख्या बढ़ने लगी- मानों गोपाल पुनः एक बार पुट्टपर्ती में बस गए | गाँव की पूर्व दिशा में किले के अवशेष के रूप में एक स्तम्भ आज भी पुट्टपर्ती के प्रभुत्व और उसके बलशाली मुखियाओं की यशोगाथा सुना रहा है |

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