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श्री सत्यसाई बालविकास कार्यक्रम - एक विहंगम दृष्टि

श्री सत्य साई बाल विकास की स्थापना जिसका अर्थ है मानवीय उत्कृष्टता का प्रस्फुटन, भारत में भगवान श्री सत्य साई बाबा के आह्वान पर अपने बच्चों के आध्यात्मिक उत्थान के लिए माता पिता द्वारा बच्चों के चरित्र को ढालने की जिम्मेदारी संभालने और उन्हें उजागर करने के लिए की गई थी। बाल विकास के माध्यम से बच्चों को भारत की सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक धरोहर जो मानवता की पहचान है, को समृद्धशाली बनाने की प्रेरणा दी जाती है|

श्री सत्य साई बाल विकास कार्यक्रम की स्थापना भगवान श्री सत्य साई बाबा द्वारा की गई है जो एक सक्रिय नैतिक जीवन के लिए व्यक्तिगत प्रतिबद्धता के विश्वव्यापी नवीनीकरण को सक्षम करने के लिए है। इसमें प्रति सप्ताह लगभग एक घंटे के लिए निर्धारित प्रत्येक वर्ग में कुछ सरल किन्तु प्रभावी तकनीकों को अपनाया जाता है जैसे प्रार्थना, समूह गायन, मौन बैठक, कहानी कथन एवं सामूहिक गतिविधियाँ|

पाठ्यक्रम की विशेषता

नौ वर्षीय प्रोग्राम की संरचना सविस्तार तीन समूहों में पाँच से तेरह वर्षीय बच्चों के बीच विभाजित की गई है| प्रोग्राम संरचना का मुख्य उद्देश्य बच्चों में मूलभूत मानवीय मूल्य सत्य, धर्म, शांति, प्रेम तथा अहिंसा का रोपण करना को तथा उनका दैनिक जीवन में अभ्यास करना|

प्रथम समूह: पाँच से सात वर्ष

बाल्य काल में प्राप्त संस्कारों का ज्ञान जीवन पर्यन्त साथ में रहता है। हमारे स्वामी, भगवान बाबा के दिव्य कथन “समय पर प्रारंभ करो, सतर्कता से आगे बढ़ो और सकुशलता से लक्ष्य प्राप्त करो” से तो हम भली-भाँति परिचित हैं। इस दिव्य वचन को मद्दे नज़र रखते हुए, बालविकास की शिक्षा नन्हे बच्चों को 5 साल की उम्र से ही प्रदान की जाती है। बाल सुलभ मन में जब मानवीय मूल्यों और सद्गुणों का बीजारोपण होता हैं तब चरित्र निर्माण के साथ साथ, उनका उचित मार्गदर्शन भी होता है। इस उम्र के बच्चे, स्वभाव से कार्यशील व आतुर होते हैं और बहुत कुछ करना चाहते हैं, अतः पाठ्यक्रम के अंतर्गत बालविकास गुरू कई गतिविधियों को सम्मिलित कर सकतें हैं। जैसे चित्रांकन, चित्र कला व प्रदर्शन, सामूहिक कार्यकलाप, नाट्य रूपांकन, व्यवहार निरीक्षण सामूहिक गायन, कहानियांँ, प्रार्थना, मन को शांत कर बैठना आदि। इन सबके माध्यम से वे कक्षा को रोचक तथा प्रभावशाली बनायें न की सिर्फ मौखिक व्याख्यान से शिक्षा प्रदान करें।

द्वितीय समूह: आठ से दस वर्ष

यह समय लक्ष्य प्राप्ति तथा तदनुसार योजनाएँ बनाने का है। बाल-अवस्था में बोए गए बीज रूपी नींव, यहांँ एक आकार लेना शुरू कर देते हैं। इस स्तर पर, छात्रों को कहानियांँ, गीत और समूह खेल पर्याप्त नहीं है; अपितु अपनी कल्पना और जिज्ञासा को पूरा करने के लिए उन्हें बहुत कुछ चाहिए। उनके विचारों को प्रोत्साहन और बढ़ावे की जरूरत है; इसलिए इस स्तर पर सिखायी गईं पांच तकनीकें, उन्हें अपने दिमाग को काबू में रखने और इंद्रियों को नियंत्रित कर, भगवान बाबा के बताये ५ “डी” का विकास करने में अत्यंत उपयोगी हैं। इस प्रकार “त्रिकरण शुद्धि” यानी मन-वचन- व्यवहार में सामंजस्य करने की नींव रखी जाती है। द्वितीय-समूह स्तर पर, बालविकास गुरू का ध्यान बच्चों के हित और कल्पना को जीवंतता देने के लिए सजग हो जाता है।

तृतीय समूह: ग्यारह से तेरह वर्ष

बाल्यावस्था का समय, बनायी गई योजनाओं द्वारा सफलता पूर्वक लक्ष्य प्राप्ति का है। वास्तविक जीवन की प्रत्येक स्थिति में मूल्यों का उपयोग करने की शिक्षा इस अवस्था में ही, सही मायने में शुरू होती है। इस स्तर पर छात्र को अब तक जो कुछ भी सिखाया गया है उसका परीक्षण करने के लिए उसे एक व्यावहारिक वातावरण चाहिए। इसलिए गुरू, छात्र को कक्षा में, पाठशाला में या संगठनात्मक परिस्थिति में भी सीखने और अभ्यास करने के लिए पर्याप्त अवसर प्रदान करता है।समूह-3 के स्तर पर, गुरू एक मांँ और शिक्षक ही नहीं अपितु, छात्र की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए, उसके लिए एक विश्वासी और दोस्त की भूमिका भी निभाती है।

पाठ्यक्रम वैशिष्ट्य
(प्रारंभिक समय का प्रभाव स्थायी होता है)
  • विभिन्न देवी-देवताओं के सरल श्लोक.
  • मूल्यपरक कहानियांँ
  • भजन नामावली / मूल्यपरक गीत
  • भगवान श्री सत्य साई बाबा का जीवन-परिचय
(संवर्द्धन काल द्विअंकीय आयु से)
  • भगवद् गीता से चयनित श्लोक
  • रामायण तथा महाभारत में चयनित प्रसंग
  • भजन नामावली / मूल्यपरक गीत
  • संतों/महात्माओं एवं विश्वास की अखंडता की कहानियांँ
  • एकत्व में विश्वास
  • भगवान श्री सत्य साई बाबा का जीवन चरित्र एवं उनके उपदेश
(किशोरावस्था – चुनौतिपूर्ण समय)
  • भजगोविन्दम तथा भगवद् गीता से चयनित श्लोक
  • श्री रामकृष्ण परमहंस तथा स्वामी विवेकानन्द जैसी महान विभूतियों के जीवन चरित्र
  • श्री सत्य साई सेवा संगठन द्वारा किये मानवीय सेवा के संदर्भ में होने वाले अनुभवों एवं अनुभूतियों का परिचय देना
रूपांतरणोन्मुखी न कि जानकारी परक
  • श्री सत्य साई बाल विकास का आदर्श, स्वच्छ एवं स्पष्ट अंतःकरण वाली एक पीढ़ी का पालन-पोषण करना है।
  • इसलिए यहांँ मात्र पुस्तकीय ज्ञान पर जोर नहीं दिया जाता, बल्कि आंतरिक परिवर्तन लाने में अथक प्रयास किया जाता है।
  • एक परिणाम के रूप में, परिणाम केवल प्रगति कार्ड और मूल्यांकन पत्रक के रूप में नहीं देखे जाते हैं; इसके विपरीत परिणाम अमूर्त होते हैं और बच्चों के दिन-प्रतिदिन के व्यवहार में महत्वपूर्ण परिवर्तनों के माध्यम से देखे जाते हैं, जिसके फलस्वरूप बच्चे के अंतर्जगत एवं बाह्यजगत में सामंजस्य होता है।
  • एक बच्चा जो बालविकास की साप्ताहिक कक्षाओं में नियमित रूप से भाग लेता है, उसके व्यवहार में सकारात्मक परिवर्तन और मनोवृत्तियों में बदलाव आना स्वाभाविक व अनिवार्य है, जैसा कि नीचे दिखाया गया है:
श्री सत्य साई बाल विकास के प्रथम समूह के समापन के पश्चात्
  • कक्षा से बाहर का अनुशासन जैसे ड्रेस कोड, छात्र एवं छात्राओं के लिए अलग बैठने की व्यवस्था |
  • ऐसे नियमित अनुशासन को अन्य परिवेशों जैसे घर/अन्य कक्षाओं आदि में भी यथावत लागू रखना |
  • माता-पिता का सम्मान करना |
  • दिवस पर्यंत (प्रातः/भोजन के पूर्व/रात्रि) भगवान का स्मरण प्रार्थना द्वारा करना |
  • भगवान को अपना परम् प्रिय मित्र समझना।
श्री सत्य साई बाल विकास के द्वितीय समूह के समापन के पश्चात्
  • भगवद् गीता के उपदेशों का दैनिक जीवन में प्रयोग। अन्य धर्मों/पर्वों की महत्वपूर्ण जानकारी एवं विशेषताएं
  • अन्य धर्मों/सभी त्योहारों के उत्सवों की महत्वपूर्ण विशेषताओं और प्रथाओं को समझना और उनकी सराहना करना।
  • अंतरात्मा की आवाज़ को सुनना एवं अच्छे व बुरे का न्यायोचित विभेद करना
  • दैनिक जीवन में 5 Ds की भूमिका का परिचय (I) भक्ति (ii) विवेक (iii) अनुशासन (iv) संकल्प (v)कर्तव्य
  • भगवान को एक सच्चा परामर्शदाता और गुरु स्वीकारना जो कि हमारे ऊपर सदैव कृपा दृष्टि बनाए रखते हैं और सदैव हमारा मार्गदर्शन करते हैं
श्री सत्य साई बालविकास तृतीय समूह के समापन के पश्चात्
  • सभी वस्तु एवं प्राणियों में ईश्वर को देखें।
  • इस मानव जीवन के सार एवं उद्देश्य को जानना, आत्मनिरीक्षण करना एवं हमारे चारों ओर प्रत्येक व्यक्ति/प्रत्येक वस्तु के भीतर दैवत्व के दर्शन करने की सीख (भजगोविन्दम के श्लोकों का प्रयोग)
  • जीवन में उत्कृष्टता का लक्ष्य तथा इस लक्ष्य को पाने के लिए अनिवार्य पद्धतियों की सतत् साधना (भगवद् गीता के श्लोकों का प्रयोग)
  • इच्छाओं पर नियंत्रण करने का अभ्यास करें। अपनी इच्छाओं की सीमा तय करें।
  • विचार, श्वास और समय के प्रबंधन के माध्यम से अपने व्यक्तित्व को आकार देने के लिए आवश्यक कौशल को बढ़ायें।
  • देशभक्त होना तथा अपनी मातृभूमि के प्रति आसक्ति रखना; सामुदायिक सेवाओं में भागीदारी द्वारा सामाजिक चैतन्यता को अपने अंदर विकसित करना
  • अपने व्यक्तित्व को आकार देने के लिए विचार, सांस और समय के प्रबंधन के माध्यम से शाला, घर एवं समाज में अपने कर्तव्यों का सही ढंग निर्वहन करने के लिए आवश्यक कौशल विकसित करना जरूरी है।
  • समस्या का निदान और प्रबंधन व नेतृत्व, ऐसे कौशल को विकसित करना; ‘जीवन एक खेल है, उसे खेलें’ और ‘जीवन एक चुनौती है उसका सामना करें’ का यथार्थ अभिप्राय समझना
  • महावाक्यों के अर्थगर्भित महत्त्व को समझकर, ‘अहम ब्रह्मास्मि’ की पराकाष्ठा को आत्मसात् करना|

उपरोक्त दैवीय योजना बच्चे में रूपांतरण की सशक्त कुंजी है न कि मात्र विस्तृत सूची। श्री सत्य साई बाल विकास का दैविक और व्यापक उद्देश्य यही है:

  • प्रत्येक बच्चे को मानवीय मूल्य विकसित करने में सक्षम बनाया जाए
  • इन मूल्यों को दैनिक व्यवहार में लाने के लिए आवश्यक कौशल विकसित किया जाए
  • जिससे व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामुदायिक और राष्ट्रीय सद्भावना को बढ़ावा मिले।

बाल विकास कक्षाएंँ इस प्रकार आज के बच्चों को निर्देशित करने के लिए श्री सत्य साई संगठनों के वैश्विक मिशन के एक भाग के रूप में संचालित की जाती हैं – “आज के बच्चे, कल के समाज” के मशाल वाहक, आत्म-जांच और आत्म-खोज के पथिक हैं अतएव इस कार्य को एक सेवा के रूप में किया जाता है और बालविकास वर्गों के लिए कोई शुल्क नहीं लिया जाता है।”

साथ ही, श्री सत्य साई शिक्षा में डिप्लोमा बच्चों को 9 साल के कार्यक्रम के अंत में प्रदान किया जाता है जब वे नियमित रूप से कक्षाओं में भाग लेते हैं और पूरे 9 साल के पाठ्यक्रम को पूरा करते हैं।

श्री सत्य साई बालविकास प्रोग्राम में अभिभावकों की भूमिका

आज के समाज की अधिकांश समस्याओं का अकादमी उत्कृष्टता की विश्वसनीयता के आधार पर तो पता लगाया जा सकता है पर उनमें स्थित मानवीय मूल्यों के आधार पर वो कितनी खरी है यह नहीं बताया जा सकता। श्री सत्य साई बाल विकास कार्यक्रम युवा पीढ़ी को इस तरह के दुर्भाग्यपूर्ण प्रभावों के प्रति निर्भीक बनाना चाहता है और इसमें “पेरेंटिंग” एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। श्री सत्य साई पेरेंटिंग कार्यक्रम अभिभावकों को उन चुनौतियों के लिए सचेत करता है जो उनके बच्चों को मीडिया और उपभोक्तावाद के प्रभाव के कारण आती हैं और माता पिता की भूमिका को मानवीय मूल्यों के शिक्षाविदों के रूप में उजागर करता है इसलिए इस कार्यक्रम की सफलता के लिए निम्न बिंदुओं पर माता पिता की प्रतिबद्धता अनिवार्य है।

  • नौवर्षीय संरचना में ढले उक्त प्रोग्राम के प्रति पूर्णरूपेण प्रतिबद्धता
  • अपने बच्चों की प्रत्येक साप्ताहिक कक्षा में नियमित तथा यथासमय भागीदारी सुनिश्चित करना
  • मूल्यपरक बाल विकास प्रोग्राम में संपूर्ण आस्था
  • उन्हीँ मूल्यों की घर पर पुनरावृत्ति
  • इस पूर्णरूपेण निःशुल्क सेवा की श्रेष्ठता की समझ
  • नियमित अंतराल में प्रतिपुष्टि (फीडबैक)
  • अभिभावक संपर्क कार्यक्रम की प्रगति चर्चा में उत्साहपूर्वक भागीदारी
  • पारिवारिक संबंधों को सुसाध्य करने हेतु अभिभावक संपर्क कार्यक्रम में भागीदारी
समग्र तथा एकीकृत व्यक्तित्व विकास

इस प्रकार श्री सत्य साई बाल विकास प्रोग्राम, नीचे दिये गये पांच स्तर पर, बालकों के संपूर्ण संघटित व्यक्तित्व विकास को सुनिश्चित करता है|

  • भौतिक
  • बौद्धिक
  • भावनात्मक
  • मानसिक
  • आध्यात्मिक

श्री सत्य साई बाल विकास की बहुआयामी योजना प्रत्येक बालक-बालिका, विद्यार्थी, युवा वर्ग एवं मनुष्य मात्र में निहित उत्कृष्टता को उजागर करने वाली है। यह कार्यक्रम इस बात की अनुभूति कराता है कि हम सब दिव्यात्म स्वरूप हैं और हमें मानवीय मूल्यों का दैनिक जीवन में प्रयोग कर स्वयं में रूपांतरण लाना है। श्री सत्य साई एजुकेयर के माध्यम से भगवान बाबा का यही दिव्य संदेश है।

तो आइए, हाथ मिलाकर साथ में काम करें...

Image reference: Sai Spiritual Education Teacher’s Manual, USA – 3rd edition, Revision 20211

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